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लेखक “जतिंदर आर्य” की कलम से ग़ज़ल “तेरे मेरे दरमियाँ”

Ghazal "Tere Mere Darmiyan" from the pen of the author "Jatinder Arya"

इक नदी उफनती है तेरे मेरे दरमियाँ,
ये कैसा राबिता है तेरे मेरे दरमियाँ।।

प्यार तकरार गिला गुस्सा सब कुछ तो है,
फिर भी इक ख़ला है तेरे मेरे दरमियाँ।।

ज़माना होता तो बात और ही कुछ थी,
कोई अपना आ खड़ा है तेरे मेरे दरमियाँ।।

हल होता है और फिर दरपेश होता है,
ये कैसा मसअला है तेरे मेरे दरमियाँ।।

इंतज़ार करुंगा कब तक वस्ल का मैं,
रह गया इक फासला है तेरे मेरे दरमियाँ।।

ज़िन्दगी भी तो अब ख़ाक होने को है,
अब तो बस धुंआ है तेरे मेरे दरमियाँ।।

दामन मैं छोड़ दूँ मुमकिन नहीं तेरा,
तवील सिलसिला है तेरे मेरे दरमियाँ।।

जतिंदर आर्य “रफ़ीक”

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